सिंह राशि

Rashi Description

सिंह को राजसी राशि कहा जाता है, राजसी ग्रह सूर्य इसका स्वामी होता है यह क्रूर एवं अग्नि तत्त्व की लग्न है, जो पूर्व दिशा को संचालित करती है। स्वभावतः यह स्थिर लग्न है तथा शीर्ष स्थान से इसका उदय होता है, इसलिये इसे शीर्षोदय राशि के अन्तर्गत रखा गया है। सिंह राशि में 1 से 20. तक सूर्य मूल त्रिकोण में माना जाता है। इस लग्न के लिये मंगल योग कारक ग्रह होता है। सिंह लग्न में जन्मे जातक देखने में अति आकर्षक होते हैं, उनके कन्धे चौड़े होते हैं तथा मुख की आकृति चौडी और पुष्ट होती है, उनकी आँखें सुन्दर और भाव प्रगट करने वाली होती हैं, ऐसा जातक देखने से ही बहुत साहसी प्रतीत होता है तथा उसके शरीर का ऊपरी भाग ज्यादा पुष्ट एवं बली होता है। सिंह लग्न में जन्म लेने वाला जातक अति आनन्द प्रिय होता है तथा आनन्द से ही जीवन व्यतीत करता है, अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। वह स्पष्टवादी और निष्कपट होता है। नीच कर्म से ऐसा जातक घृणा करता है, समता का व्यवहार रखता है धैर्यवान् और उदार होता है। वह जिस कार्य को अपने हाथ में लेता है उसे संलग्नता पूर्वक निष्ठा के साथ करता है। ऐसा जातक एकाएक उत्तेजित नहीं होता बल्कि समझ से काम लेता है। उसमें आगे बढ़ने की इच्छा और बढ़ते ही जाने का ध्येय बहुत तीव्र होता है। कला संगीत नाटक सिनेमा आदि में उसकी अभिरुचि होती है। सिंह लग्न में जन्म लेने वाला जातक अपने आप को किसी भी परिस्थिति में सुखी रख सकने में समर्थ हो सकता है। प्रेम के विषय में सिंह लग्न की जातिकाएं बहुत गम्भीर एवं विश्वसनीय होती हैं। ऐसे लोग रूढ़िवादी एवं परम्पराओं में विश्वास करने वाले एवं मानने वाले होते हैं। प्रायः ऐसे व्यक्ति प्रसन्न चित्त रहते हैं परन्तु जरा सी बात उन्हें बहुत चुभ जाती है। जीवन के अन्त में प्राय: वह असफल रहते हैं, क्योंकि उनकी आशाएं और अपेक्षाएं अत्यधिक होती हैं जिन्हें प्राप्त करने के लिये वे लगातार प्रयत्नशील रहते हैं। उनकी इच्छाएं प्राय: अधूरी रह जाती हैं। उन्हें अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ता है क्योंकि उन्हें किसी कार्य को नीति संगत तरीके से करना या किसी नियम या कारण में बँधकर रहना नहीं आता। उनमें क्षमा कर देने की तथा किसी को अपने मन में लम्बे समय तक न बिठाये रखने की एक अद्भुत शक्ति होती है। सिंह लग्न के व्यक्ति अपने अधिकारियों तथा बड़ो के द्वारा गलत समझे जाते हैं और अधिकारीगण उनके विषय में समुचित धारणा नहीं बना पाते। उनके रहन-सहन से बड़प्पन प्रतीत होता है, वे मित्रता में अटल और विश्वसनीय होते हैं। दु:ख और चिन्ता के समय में अपनी सूझ-बूझ, बुद्धिमत्ताबऔर दूरदर्शिता से काम लेते हैं। उसे हल करने में समर्थ होते हैं। शत्रुओं से झगड़ा नहीं करते बल्कि धैर्य से काम लेना उचित समझते हैं। सिंह लग्न के पुरुष बहुत ही निर्भीक, साहसी और उद्यमी होते हैं। सिंह लग्न का स्वामी सूर्य इस लग्न के लिये शुभ फल देता है, परन्तु पंचम भाव में सूर्य को पूर्णतया शुभ नहीं मानना चाहिये। यद्यपि पंचमस्थ सूर्य शुभ नहीं होता तथापि पुत्र का जन्म अधिक होता है, सिंह लग्न के व्यक्तियों के प्राय: सन्तानें कम होती हैं और सन्तानों में भी या तो पुत्र ही होते हैं अथवा केवल पुत्रियां ही होती हैं। जहां पुत्र और पुत्रियाँ दोनों होते हैं वहां यदि पुत्र अधिक योग्य और वैभव सम्पन्न होते हैं तो पुत्रियां शुभ स्थिति में नहीं होती। यदि जातक का जन्म सिंह में हो तो उसके मुख की आकृति चौड़ी और हड्डी पुष्ट होती। उसकी आँख सुंदर और भाव प्रकट करने वाली होती है। ऐसा जातक अनान्द से जीवन व्यतीत करता है। शत्रुओं और विरोधियों पर विजयी रहता है । स्पष्टवादी होता हुआ ऐसा जातक निष्कपट और मनसा, वाचा पवित्रता पालन करने वाला होता है। नीच कर्मनसे घृणा करता है, धैर्यवान और उदार होता है । जिस कार्य को लेता है उसको ईमानदारी तथा निपुणता के साथ करता है। वह अपने गुणों तथा साहस से विघ्न बाधाओं का शीघ्र निपटारा कर सकता है। नीच कर्म से लाभ की सम्भावना होने पर भी वह उससे घृणा करता है। अपनी मर्यादा के पालन में सर्वदा तत्पर रहता है। उसके रहन सहन से बड़प्पन प्रतीत होता है। मित्रता में अटल तथा विश्वास पात्र होता है । ऐसा जातक केवल दयालुही नहीं होता, बल्कि सत्पात्र की रक्षामें भी तत्पर रहता है ।दुःख के समय में अपनी सूझ बूझ-को काम में लाकर दुःख के निवारण में समर्थ होता है। शत्रुओं से झगड़ा नहीं करके धैर्य से काम लेता है। शान्ति पूर्वक व्यवहार करता है। उपकी रुचि, आलसी मनुष्यों के प्रति, तथा ऐसे लोग जो उद्यम द्वारा अपनी अवस्था की उन्नति नहीं करते हैं, अच्छी नहीं होती है। ऐसे जातक को अपने उद्यम और परिश्रम का फल पूर्ण रूप से नहीं होता है। लोगों पर ऐसे जातक के गुणों का प्रभाव विशेष रूप से पड़ता है। वह अपनी आशा तथा रुचि के अनुसार अन्य मनुष्यों को चलाने में कुशल होता है। जीवन के शेष भाग में प्रायः विशेष सुखी और धनी होता है। ऐसा जातक कभी कभी प्रवासी होता है और उसे कम सन्तान होते हैं । कन्या होने से कुछ विशेष गुण दोषः-दुबली, पतली, कफ प्रकृति की, रोगिणी और चिड़चिड़ाही तथा झगड़ालू होती है। परन्तु दानशीला होती है। सिंह लग्न वाले के लिये मंगल उत्तम फल-दायक होता है । मंगल और वृ. का परस्पर सम्बन्ध होने से राजयोग होता है और शुक्र के योग से उतना उत्तम फल नहीं होता है। शनि, शुक्र और बुध ऐसे जातक को निकृष्ट फल देने वाले होते हैं। चं. का साधारण फल होता है। शनि उतना बली मारकेश नहीं होता है। परन्तु बुध मारकेश में बली होता है। सूर्य और बुध के एकत्रित रहने से ऐसा जातक कार्य-कुशल होता है। परन्तु उसकी सम्पत्ति थोड़ी और आय साधारण होती है। मंगल और शनि के द्वादशस्थ होने से शनि की दशान्तरदशा में जातक के विभव की उन्नति होती । राहू और केतु के मारकस्थान में रहने से मृत्यु-दायी होता है। वृ. और शु. एकत्रित होने से राज-योग नहीं होता है। पांचवें नवांश में लग्न के रहने से प्राकृतिक स्वभाव का पूर्ण विकास होता है। चेतावनी ऐसे जातक को गर्म पदार्थ तथा मादक वस्तुओं का सेवन निषिद्ध है उत्तेजना और जल्दीवाजी के कामों से बचना उचित है । शरीर के रुधिर की रक्षा सर्वदा उपयोगी है। ज्वर होने पर उसकी उचित औषधि शीघ्रता पूर्वक होनी चाहिये । बहुत ही आश्वस्त, एवं स्वयं से संदेह रहीत सोच, उनको ये ज्ञात होता हैं की बिना अधिक प्रयासों के जीवन में पाया नहीं जा सकता | वे प्रायः हावी होना चाहते है, वे संकोची हो सकते हैं परन्तु उनका आत्मविश्वास प्रबल होता हैं | वे प्रायः अधिक बात नहीं करते, शांत ही रहते है, परन्तु किसी कक्ष मीटिंग में तभी जायेंगे, जब उनको भी अधिकार हो या लोग उनके ऊपर ध्यान दें | वे प्रायः प्रतिक्रिया नहीं देते, जबतक की उनको लगे नहीं की बोलना चाहिए | वे परिवार के सम्बन्ध में बहुत विचारपूर्ण आचरण करते हैं - पिता से इस प्रकार, माता से इस प्रकार से आचरण करना है | धन संग्रह सम्बन्धी बहुत गणना करने में सक्षम होते हैं | भाई-बहन, पडोसी से सम्बंधित आचरण में बहुत ही विचारवान होते हैं, इनसे ऐसे बात करनी हैं और उनसे ऐसे | रचनात्मक वाक् शैली, जब वे बोलते है, तो लोगों को उनकी स्फूर्ति, गतिशीलता का अनुभव होता हैं | परिवार को लेकर बहुत सुरक्षात्मक विचार होते हैं, वे अपने घर के माहौल से बहुत गहराई से जुड़े होते हैं - विशेषकर माता से बहुत अधिक जुड़ाव - चन्द्रमा और मंगल की स्तिथि अनुसार परिवर्तन देखे जा सकते हैं | दार्शनिक विचार वाले, वे बच्चों को जीना सिखाना चाहते हैं - ऐसे जियो, ऐसे करो | अच्छे वकील, सलाहकार, अध्यापक होते हैं | वे परंपरागत बातें और सांस्कृतिक विषय बच्चों को समझाना या देना चाहते हैं | जीवन में विरोध का सामना बहुत होता है, जो इनको ललकारता अथवा शत्रुता करता है वो अंत में आपको एक सबक सिखा जाता है | ये अपने जीवन साथी के साथ प्रायः हर समय होते हैं, इनकी पत्नी एक उद्देश्य पूर्ति के लिए जुडी रहती हैं, वो कैसा भी उद्देश्य हो, परिवार की सुरक्षा, धन संबंधी अभिलाषा आदि | अच्छे ज्योतिषी, तांत्रिक गुरु की स्तिथि के अनुसार - उनको रहस्यात्मक विषयों के विषय में अधिक जानकारी होती हैं, यदि नहीं हैं तो उनके लिए ऐसी जानकरी प्राप्त करना आसान होता है | गुप्त एवं दुर्लभ ज्ञानवान | वे धार्मिक चरमपंथी होते हैं, वे सभी को ऐसा दर्शा भी देते हैं | वे जो मानते हैं, वो ये मानते हैं उससे हिलते नहीं | वे प्रायः उच्च शिक्षा ग्रहण नहीं करते, परन्तु दार्शनिक ज्ञान बढ़ाते हैं | तृतीय भाव से सम्बन्ध होने के कारण एवं शुक्र की स्थति के अनुसार वे स्टेज पर जाना चाहते हैं, टीवी में जाना चाहते हैं, वकील. वक्ता गतिवान (dynamic) व्यक्तित्व, वे लोगो द्वारा नोटिस किया जाना चाहते हैं | मित्र एवं समाज के मध्य बहुत ही वाचाल, वे बोलने से लाभ पाते हैं | जब वे बोलेंगे उनको सुनिए, वो आपको बदल देंगे या कुछ बेच देंगे | वे आपपर हावी भी रहेंगे, और अपनी बात मनवा भी लेंगे | जरुरतमंदों की मदद के लिए, अधिक भावुक | वे किसी की मदद के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं | उनके आध्यात्मिक विचार स्थिर नहीं होते | कभी वे अधिक आध्यात्मिक, कभी वे शून्य | कभी वे मदद करते हैं, कभी वे नहीं करना चाहते |

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Computations

सिंह लग्न के लिए शुभाशुभयोग:- (1) शुभयोग :-मंगल निसर्गतः पापग्रह होने पर भी नवम (त्रिकोण ) का अधिपति होने से श्लोक के अनुसार गुम माना गया है। वह चतुर्थ स्थान का (केन्द्र स्थान का) स्वामी भी है। इसलिए श्लोक ७ के अनुसार शुभ होने से शुभफल देने वाला है। (२) शुभयोग!-मंगल तथा गुरु चतुर्थ और पंचम स्थानों के अधिपति है। गुरु अष्टम स्थान का स्वामी भी है। यहाँ गुरु पंचम और अष्टम स्थान का अधिपति है और उसको नवम स्थान के अधिपति से साहचर्य योग के कारण शुभ माना गया है और शुभफल देने वाला है। (३) शुभयोग -सूर्य लग्न का अधिपति होने से श्लोक ६ के अनुसार शम होकर शुभफल देने वाला है। (४) अशुभयोग :- बुध द्वितीय (मारक) स्थान का स्वामी होकर एकादश स्थान का स्वामी भी है । श्लोक ६ के अनुसार वह अशुभ होने से अशुभफल देने वाला है। (५) अशुभयोग :--शुक्र तृतीय स्थान का स्वामी होने से श्लोक ६ के अनुसार अशुभ गिना गया है और दशम केन्द्र का स्वामी होने से श्लोक ७ और १० के अनुसार दूषित है। इसलिए वह अशुभफल देने वाला है। (६) अशुभयोग :-(पाठान्तर के अनुसार) शनि षष्ठ स्थान का स्वामी होने से अशुभ होकर अशुभफल देने वाला है। निष्फलयोग :-(१) मंगल + शनि; (२) गुरु + शुक्र; (३) गुरु+ शनि (दोनों ही दूषित होते हैं।) सफलयोग :-(१) सूर्य + मंगल; (२) सूर्य + गुरु (सदोष ); (३) मंगल +गुरु ( सदोष); (४) मंगल + शुक्र (सदोष); (५) मंगल अकेला शुभफलदायक है कारण वह नवम और चतुर्थ स्थान (त्रिकोण-केन्द्र) का स्वामी है।

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