धनु राशि

Rashi Description

धनु लग्न का स्वामी सर्वश्रेष्ठ शुभ ग्रह तथा मूल रूप से सन्तान कारक बृहस्पति होता है। यह द्विस्वभाव लान है। धन लान पूर्व दिशा की स्वामिनी है, तथा स्वभावतः क्रूर और अग्नितत्त्व की पुरुष राशि है। यह पृष्ठोदय राशि है, तथा अंगों में पैरों की सन्धि व जांघों का स्वामित्व इसे प्राप्त है। धनु लग्न के लोग स्वभावतः भले और सज्जन होते हैं जब तक कि लग्न अन्य ग्रहों द्वारा प्रदूषित न हो। धनु लग्न में जन्म लेने वाला जातक दार्शनिक प्रकृति का होता है, तथा ज्योतिष जैसे विषयों में उसकी रुचि होती है। धर्म सम्बन्धी विषयों का ज्ञान तथा मानवता के गुण अत्यधिक होते हैं। ऐसा जातक उदार चरित्र का तथा न्यायप्रिय होता है। अपने विचार स्पष्ट रुप से व्यक्त करता है। बहुत स्वार्थी तथा लालची नहीं होता। न्याय पाने या दिलाने के लिये यदि अथक परिश्रम भी करना पड़े, तो करता है। बुद्धि प्रखर व विचार सात्विक होते हैं। किसी भी बात का तथ्य सुगमता से समझ लेता है। धनु लग्न में जन्म लेने वाले जातक का गला लम्बा, नाक खडी तथा कान बड़े-बड़े होते हैं। मुख की आकृति किंचित चौड़ी तथा गाल पुष्ट होते हैं। उसके शरीर की बनावट दुबलेपन पर न होकर कुछ मोटापे की ओर ही प्रेरित होती है। आंखें बड़ी तथा बाल कुछ भूरापन लिये होते हैं। अधिकतर भव्य रुप रंग का होता है और उसके दांत बिल्कुल सफेद, बराबर से सुन्दर पंक्तिबद्ध और आकर्षक होते हैं। जातक की मुस्कराहट और हंसी सदा ही लुभावनी होती है। ऐसा जातक अन्य लोगों से घिरा रहना तथा अपनी प्रशंसा पसन्द करता है। सच तो यह है कि धनु लग्न के जातक सचमुच अच्छे और भले लोग होते हैं। यह बृहस्पति के गुणों से ओत-प्रोत होता है। उसकी दृष्टि में सम्पत्ति और आर्थिक उन्नति अधिक महत्वपूर्ण नहीं होती। ज्ञान सम्बन्धी विषयों, धार्मिक कार्यों, गहन मनन-चिन्तन और जीवन की सात्विकता आदर्शवादिता तथा सार्थक सत्य में जातक की विशेष अभिरुचि होती है। बिना किसी प्रकार के आडम्बर तथा दिखावटी बातों के वह शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करता है। प्राणियों की सेवा तथा किसी की सहायता करके उसे बहुत ही संतोष मिलता है। वह दयावान और उदार होता है। बुद्धिमानों और श्रेष्ठ लोगों के प्रति जातक का स्वभावतः झुकाव होता है। वार्तालाप के मध्य चुटकीली परन्तु हदय को न दुखाने वाली हास्य विनोद की बातें करता है। व्यंग्य करने में बड़ी निपुणता होती है। बुद्धिमान्, योग्य और अपने वंश तथा जाति में प्रशंसित होता है, ख्याति प्राप्त करता है तथा अपने कुल का आदर्श पुरुष होता है। उसके कार्यों की प्रशंसा तथा मधुर स्वभाव की चर्चा जगह-जगह होती है। उसे उच्च कक्षा के व्यक्ति तथा उच्चपदस्थ अधिकारी का निकट सान्निध्य प्राप्त होता है। कभी-कभी ये गुण ही उसके लिये विषम परिस्थितियों को भी जन्म देते हैं। धनु लग्न का जातक कफ प्रकृति का, रुढ़िवादी विचारों का तथा व्यापार में रुचि लेने वाला होता है। कुछ हद तक उसे पुराने विचारों का भी माना जाता है। इसलिये आदर्शवादिता के नाम पर विचारों में पुरानी आस्थाओं तथा स्थापित गूल्यों को लेकर संकीर्णता आ जाती है। कहीं पक्ष विपक्ष की बात हो तो वह आदर्श और श्रेष्ठ मार्ग पर प्रशस्त व्यक्ति का ही पक्ष लेगा। ऐसे लोग प्रिय तो होते ही हैं, परन्तु उन्हें दूर दृष्टि का भी आभास होता है। बनावटी बातों से दूर रहता है। अपने खान पान पर बहुत नियन्त्रण रखता है, साथ ही विपरीत योनि के साथ अपने सम्बन्धों को बहुत नियन्त्रित रखता है। उन्हें अपने फेफड़ों तथा छाती से सम्बन्धित अन्य रोगों के प्रति सचेत रहना चाहिये। वृद्धावस्था में धनु लग्न के जातकों को जोड़ों में दर्द या गठिया व बात सम्बन्धी विकार होने की सम्भावना रहती है। इन्हें अधिक परिश्रम से बचना चाहिये। दुर्घटना, शरीर में किसी प्रकार की चोट व फोड़े आदि होने का भय रहता है। प्राय: रुधिर विकार के कारण शारीरिक कष्ट होता है, इसके लिये सतर्क रह कर समस्त कार्य करने चाहिये। जातक का गला लम्बा, नाक खड़ी और कान बड़े-बड़े होते हैं। मुख की आकृति किन्चित चौड़ी होती है। जातक सादा और स्पष्ट विचार का होता है। न्याय और सत्य के लिये खूब परिश्रम करता है। उसका आशय महान् होता है । वह निष्काम कर्म करता है। किसी विषय को बहुत आसानी से और बहुत जल्द समझ सकता है। बुद्धिमान् तथा कई भाषाओं का जानने वाला होता है। अपनी मेधा तथा गुण द्वारा ऐसा जातक शीघ्र ही उन्नति करता है। जातक उदार प्रकृति का होता है। उसकी दृष्टि में सम्पत्ति और आर्थिक उन्नति असत्य प्रतीत होती है। धार्मिक तथा विषयों में उसकी बड़ी अभिरूचि रहती है । बिना किसी ज्ञान के प्रकार के आडम्बर तथा दिखलावटो बातों के वह शान्तिमय जीवन व्यतीत करता है। मनुष्य जाति की सेवा में वह अपना जीवन समर्पित किये रहता है, यहाँ तक कि दूसरे के लिये वह अपने पुत्र को भी तिलांजलि देने को उद्यत रहता है। अपने नौकरी तथा आश्रितों पर ऐसे जालकी बड़ी दया रहती है। यह विमानों का बड़ा पक्षपाती होता है। यात कार में दिल्लगीवाजी और चुभती बातों के करने की उसकी अभिरुचि तथा व्यङ्ग बचन बोलने वाला होता है। ऐसा जातक पुद्धिमान, योग्य और अपने कुल वंश तथा जाति में ख्याति प्राप्त करता है और अपने कुलाति का आसान पुरुष होता है। । ऐसे जातक को बड़े-बड़े अधिकारी एवं उच्च कक्षा के लोगों से मित्रता और सम्पर्क रहता है। उसके अनेक भक्त तथा आश्रित होते है। कन्या होने से कुछ विशेष गुण दोषः दयालुता में अभिरूचि तथा करमामय चित्त वाली होती है। धन लग्न वाले को सूर्य और मंगल बहुत ही शुभफल देने वाले होते हैं। मंगल से सूर्य का फल उत्तम होता है। सूर्य और बुध का परस्पर सम्बन्ध होने से राज-योग होता है । ऐसे जातक के लिये शुक्र अनिष्टकारी होता है । वृ. साधारण फल देता है और कभी-कभी बुरा भी होता है। परन्तु मारकेश नहीं होता है । श. को स्वयं मारकत्व नहीं होता है। श. के एकादशस्थ होने से उत्तम फल होता है। चं. अष्टमेश होने पर भी अच्छा ही फल देता है । कारण, कि चं. को अष्टमेश-दोष नहीं लगता और लग्नेश वृ. का चं. मित्र है। नवम नवांश में लग्न के रहने से प्राकृतिक स्वभाव का पूर्ण विकास होता है। चेतावनी ऐसे जातक को बहुत परिश्रम से बचना उचित है। परिमित व्यायाम से सर्वदा लाभ उठाता है। व्यायाम, धूमने फिरने से स्वास्थ्य के लिये बहुत ही हितकर होता है। ऐसे जातक को दुर्घटना ( Accidents ), शरीर में किसी प्रकार से चोट आदि के लगने से और विशेष कर घोड़ों से बचने का ध्यान रखनी चाहिये। रुधिर विकार पर पूर्ण ध्यान देना चाहिये। ये लोग व्यवहार से बहुत ही दार्शनिक और ज्ञान देने वाले होते हैं, कोई भी ऐसा तथ्य जो उनके समक्ष आये और उनको अच्छा लगे, वो लोगों को बताना चाहते हैं | वे लोगों के मन को बदलने की क्षमता रखते हैं, अच्छे गुरु सिद्ध हो सकते हैं | वे बहुत की पारंपरिक परिवार से, धन के प्रति अनुसासन उनमें होता हैं | वे सट्टा आदि से धन बनाने की जगह लम्बे समय की किसी योजना में धन जोड़ना पसंद करते हैं | वे धन के जोड़ने और व्यय के प्रति बहुत सावधान होते हैं, अलग शब्दों में वे छोटे छोटे खर्चे को लिखना या जोड़ना पसंद करते हैं | वे प्रायः अधिक ज्ञानी लोगों से चर्चा करना पसंद करते हैं, वह भाई-बहनों, नजदीकी रिश्तेदार, मित्रों में भी जो उनसे अधिक ज्ञानी होगा वे उन्हीं से चर्चा करेंगे, चूंकि वे किसी अज्ञानी से बहस कर समय बर्बाद नहीं करना चाहते हैं | वे लोगों को सिखाना चाहते हैं, और इसकी शुरुआत वे अपने घर से ही करते हैं | यदि लोग उनसे कुछ सीखने आयें, तो उनको यह बहुत प्रिय होता है | इनके बच्चे प्रायः बहुत सक्रीय (एक्टिव), वे कुछ नया करते हुए ही सीखते हैं | स्पोर्ट्स में इनके बच्चे अच्छा कर सकते हैं | उनकी शत्रु अधिक नहीं होते है, वे मीठा पसंद करते हैं | वे शत्रुओं को भी मित्र बना लेते हैं, उनके शत्रु प्रायः उनके कार्य स्थान (ऑफिस) में ही होते हैं, लोग उनसे चिड़ते या इर्ष्या करते हैं | उनकी शादी जल्द ही होती है, जीवन साथी से अधिक चर्चा होती रहती है, जो की दार्शनिक प्रकार की चर्चा होती है व्यापार आदि में मिलने वाले नए व्यक्ति से भी आप अधिक चर्चा कर लेते हैं, जो की दार्शनिक प्रकार की अधिक हो सकती है | उनके पास अधिक धन वाली वस्तुएं प्रायः नहीं होती हैं, परन्तु भावनात्मक धन उनके पास होता हैं किसी की मदद करने के लिए ये किसी भी हद तक मदद कर सकते हैं | चन्द्रमा की शुभाशुभ स्तिथि से उतार चड़ाव देखे जा सकते हैं | धार्मिक आस्थाओं में वे मिश्रित प्रकार के होते हैं, उनको लगता है की दुनिया को कोई एक ही चला रहा है, जैसे ही सूर्य सभी को प्रकाश दे रहा है | उनका कार्यक्षेत्र बौद्धिक होता है, धन के आय व्यय का ब्योरा बहुत स्पष्ट करते हैं (एकाउंट), प्रायः व्यापार में हो सकते हैं - बुध यदि शुभ हों तो वे विशेषज्ञ, बुद्धिमान, गणितज्ञ अंदाजा लगाने में तेज़ होते हैं | वे समाज से बहुत अधिक नहीं जुड़ते, उनको शीघ्र धनवान होने की अभिलाषा भी नहीं होती | ये एवं इनके प्रिय मित्र भी अच्छा कमाते हैं, इनके शत्रु इनके कार्यक्षेत्र में ही होते हैं, तो कह सकते हैं वे भी अच्छा ही कमाते हैं | कोर्पोरेट में वे बहुत अच्छा करते हैं | कह सकते हैं, ये बहुत बड़े बड़े प्रतिष्ठानों (कंपनी) के साथ कार्य करते हैं | वे बहुत बुद्धिमान, लोगों का भला करने वाले, कल्पनाओं में किसी भी हद तक ही कल्पना कर पाने वाले, उनका यह ज्ञान कभी व्यर्थ नहीं जाता |

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Computations

धनु लग्न के लिए शुभाशुभ योग :- (१) शुभयोग - सूर्य निसर्गतः पापग्रह है फिर भी नवम (त्रिकोण) का स्वामी होने से श्लोक १ के अनुसार शुभ माना गया है और शुभ फल दायक होता है। (२) शुभयोग - मंगल नैसर्गिक पापग्रह है फिर भी पंचम (त्रिकोण) स्थान का स्वामी होने से लोक के अनुसार गुन माना गया होकर शुभफलदायक होता है। (३) शुभयोग - बुध दशम केन्द्र का स्वामी होने से और सूर्य नवम (त्रिकोण) स्थान का स्वामी होने से इन दोनों का स्थान साहचर्य योग उत्तम माना गया है और वह उत्तम फलदायक होता है। (४) अशुभयोग :-शुक्र नैसर्गिक शुभग्रह होने पर भी षष्ठ और एकादश स्थानों का स्वामी होने से अशुभ होकर अशुभफल देने वाला होता है। (५) अशुभयोग :-शनि द्वितीय स्थान का स्वामी होकर तृतीय प्रशुन स्थान का भी स्वामी होने से वह अशुभफलदायक होता है। (६) अशुभयोग :-बुध सप्तम (मारक) स्थान का और दशम (केन्द्र स्थान) स्थान का स्वामी होने से श्लोक ७ के अनुसार वह अशुभफल देने वाला होता है । (७) अशुभयोग :-गुरु लग्न और चतुर्थ केन्द्र स्थान का स्वामी होने से श्लोक ७ और १० के अनुसार अशुभफल दायक होता है । (८) अशुभयोग :-चन्द्रमा अष्टम स्थान का स्वामी होने से अशुभफलदायक होता है। निष्फल योग :- (१) मंगल + बुध सफल योग : (१) मंगल + गुरु; (२) सूर्य + गुरु; (३) सूर्य + बुध (निकृष्ट )।

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